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संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा का पाचवा दिन

फतेहपुर नि.सं.
मलवा विकास खण्ड के शिवराजपुर आदिगुरु शंकराचार्य आश्रम दुर्गा मंदिर मे चल रहे नवदिवसीय धार्मिक अनुष्ठान शतचण्डी महायज्ञ व श्रीमद् भागवत कथा मे श्रद्धालु भक्तो का भक्तिभाव देखते ही बन रहा है। कोरोना संक्रमण की जागरुकता के लिये शारीरिक दूरी के साथ कथा पंडाल मे हाथो को सैनेटाईज कराया जा रहा है। यज्ञ मे डाली गई सुगंधित समाग्रियो के धूम्र से सुवाहित हो रहे वातावरण हर किसी को मोहित कर रहा है। कथा व्यास पंडित यदुनाथ अवस्थी ने पाचवे दिवस गजेन्द्र मोक्ष,समुद्र मंथन के प्रसंग का बड़ा ही मार्मिक वर्णन श्रोताओ को श्रवण कराया तो भक्त विह्ववल हो उठे।उन्होने कहा भक्त की करूण पुकार सुनकर भगवान दौडे चले आते है। उन्होने गीत आसरा इस जहा का मिले न मिले,मुझे तेरा सहारा सदा चाहिये… सुनाकर कथा का महात्म्य समझाया।उन्होने बताया क्षीरसागर में दस हजार योजन ऊँचा त्रिकुट नामक पर्वत था। उस पर्वत के घोर जंगल में बहुत सी हथिनियों के साथ एक गजेन्द्र नाम का हाथी निवास करता था। वह सभी हाथियों का राजा था। एक दिन वह उसी पर्वत पर अपनी हथिनियों के साथ झाड़ियों और पेड़ों को रौंदता हुआ घूम रहा था। उसके पीछे-पीछे हाथियों के छोटे-छोटे बच्चे तथा हथिनियाँ घूम रही थी। धूप के कारण उसे तथा उसके साथियों को प्यास लगी। तब वह अपने समूह के साथ पास के सरोवर से पाने पी कर अपनी प्यास बुझाने लगा। प्यास बुझाने के बाद वे सभी साथियों के साथ जल- स्नान कर जल- क्रीड़ा करने लगे। उसी समय एक बलवान मगरमच्छ ने उस गजराज के पैर को मुँह मे दबोच कर पानी के अंदर खीचने लगा। गजेंद्र ने अपनी पूरी शक्ति लगा कर स्वयं को छुड़ाने की कोशिश की लेकिन असफल रहा। उसके झुण्ड के साथियों ने भी उसे बचाना चाहा पर सफल ना हो सके। जब गजेंद्र ने अपने आप को मृत्यु के निकट पाया और कोई उपाय शेष नहीं रह गया तब उसने प्रभु की शरण ली और प्रभु की स्तुति करने लगा। जिसे सुनकर भगवान श्री हरि ने स्वयं आकर उसके प्राणों की रक्षा की। इस कथा समापन पर आरती के बाद भक्तो को प्रसाद वितरित किया गया।आयोजक स्वामी सत्यांंनद जी महाराज,युवा विकास समिति के प्रवक्ता आलोक गौड़,रामशंकर आर्य,अनिल सिंह,पप्पू ,आचार्य राजन अवस्थी,आचार्य पंकज तिवारी आदि रहे।

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